सुनो

सुनो

कुछ न कहो

ज़रा चुप रहो

ये जो बेमानी से अलफ़ाज़ हैं

घुल जायेंगे हवाओं में

और खो जायेंगे कहीं

पढो ज़रा मेरी आँखों को

कहो ज़रा अपनी आँखों से

यही वो भावपूर्ण संवाद है

जो अजर है…..अमर है…..

संवेदनाओं का इक पौधा

 

संवेदनाओं का इक पौधा

पल रहा है मेरे भीतर

मुझे याद है वो दिन

जब मैंने इसका बीज बोया था

मुझसे कहा गया था कि

संवेदनाएं बुरी होती हैं…कष्टदायी…इनसे दूर रहो!!

मगर मैं भी अपनी ज़िद में थी…अडी रही….

किसी ने इसे प्यार से सींचा तो किसी ने दुत्कार से

कभी हंसी की लडियां मिली तो कभी आंसू की झाड़ियाँ

कहीं से लाड दुलार पाया तो कहीं से झिडकियां और झल्लाहटें

वो पौधा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ रहा है!!

लेकिन उस पर केवल एक ही प्रकार के फल आतें हैं…प्रेम और केवल प्रेम के…

और सच कहूं तो बहुत सुखदायी है

संवेदनाओं का इक पौधा…

मुस्कराहटें

क्यों किसी और के मोहताज़ हो जायें हम
क्यों न ख़ुद के वास्ते ही मुस्कुरायें हम

रश्क करे हमसे तो करता रहे ये जहाँ
क्यों न अपनी इक अलग दुनिया बसाएं हम

हंसना और हंसाना है नहीं आसान काम
ये बात कब तक और किसको समझायें हम

कब तलक तकते रहेंगे ख़ाली ख़ाली दीवारों को
ऐसा करें कि आईने को ही साथी बनायें हम

इनका क्या गिले शिक़वे साथी हैं ताउम्र के
चल किसी रूठे हुए को गले लगायें हम

एक मुसकान से उपजती हैं सैकड़ों मुस्कानें
‘अदा’ ये करिश्मा भी आज कर दिखाएं हम

कुंजी

” रति  तुम्हे समझ नहीं आ रहा कि वो हमारा इस्तेमाल कर रहे है…. तुम बिलकुल पागल हो गयी हो!! वाकई तुम समझ नहीं पा रही इसका क्या मतलब है??” कमल गुस्से में बोलता ही जा रहा था। पर उसके विपरीत राति लगातार मुस्कुरा रही थी।

रति जानती थी कमल इतना गुस्सा क्यों है। कुछ साल पहले कमल इतना ही खुश था जब उसे दो दो खुशखबरी एक साथ मिली थी। विवेक की नयी जॉब और उसकी फ्रेंड शीतल से उसकी शादी।

जब विवेक और शीतल ने गुडगाँव में नया फ्लैट बुक करवाया था तब कमल और रति फूले नहीं समाये। मगर बहुत जल्दी उनकी ये ख़ुशी काफ़ूर हो गयी। अब उनका बेटा और बहु अपने नए घर में रहना चाहते थे, क्योंकि इस घर में शीतल की पढाई ठीक से नहीं हो पा रही थी।

किस तरह रति ने कमल को संभाला था, ये रति ही जानती थी। बच्चा होता तो डाँट देती, मगर कमल तो बस….बच्चों से भी ज्यादा व्याकुल हो उठे थे।

आज भी वही हाल था। जब से विवेक का फ़ोन आया था कमल सारे घर में गुस्से से चहल कदमी कर रहा था। और रति, शायद आज उसे कमल में भी विवेक ही नज़र आ रहा था, पूरे धीरज से उसकी हर बात सुन रही थी। मौके के इंतज़ार में…. जब वो भी अपने मन की बात कमल से बोल पाये।

” क्यों मुस्काये जा रही हो तुम?? मैंने कोई जोक सुनाया है क्या!!” आखिर कमल झल्ला उठा।

रति ने फिर से अपनी स्निग्ध मुस्कान बिखेरी, ” कमल तुम हमेशा कितने अधीर हो उठते हो, बिना कुछ आगा पीछा सोचे। कहाँ तो बच्चों के जाने पर इतना दुखी हो रहे थे और कहाँ आज इत्ती ज़िद्द पे अड़े हो। क्या बुराई है अगर विवेक और शीतल ऑफिस जाते हुए आरव को हमारे पास छोड़ जाएँ? हम दादा दादी है आरव के। हम अगर नहीं ख़याल रखेंगे उसका तो कौन रखेगा?”

“रति, तुम्हारी बुद्धी कुंद हो गयी है!!! वो लोग इतने स्वार्थी हैं कि बिन हम दोनों के बारे में सोचे यहाँ से चले गए। आज जब जरूरत पड़ी तो आरव को हम संभाले। क्या जरूरत है इतना सीधा बनने की हमें?? हम भी अपनी अहमियत जता सकते हैं। मना भी कर सकते हैं।”

” नहीं कमल, पूरा दिन अकेले रहते हैं। कभी योग, कभी क्लब, कभी कीर्तन तो कभी मूवीज, ना बची हुई उम्र किताबें पढ़ के या संगीत सुन के निकाल सकते हैं। आरव आएगा तो घर में कितनी रौनक रहेगी। उसकी बातें, तोतली भाषा में, उसका मटकाना पूरे घर में, भाग दौड़, आँख मिचौली, और क्या क्या नहीं। इस बहाने और किसी से भी जुड़ेंगे, मिलेंगे। क्या पता थोड़े दिनों बाद विवेक और शीतल भी हमारे साथ वापस आ जाएँ। अब आरव ही हमारी खुशियों की कुंजी है, समझे मेरे बुद्धुराम। चलो नीचे चले। वो लोग आते ही होंगे।”

परले दर्ज़े के मूर्ख

“ऐसे नहीं ख़ुशी, पेंसिल को ऐसे पकड़ते हैं। बिल्कुल ठीक। ऐसे ही। अब 2 का पहाड़ा लिखो। कल सिखाया था, याद है न, भूली तो नहीं!”

“याद है आंटी, अभी लिखती हूँ…. दो एकम दो, दो दूनी चार, दो तिया छः, दो चौके आठ, दो पंजे 10, 2 छके……. उम्म्म……क्या था दो छके……”

“थोडा ज़ोर डालो दिमाग पे…. कोशिश करो तुम कर लोगी बेटा, बस थोडा ध्यान दो इधर।”

“हाँ जी आंटी, कोशिश करती हूँ…..दो एकम दो, दो दूनी चार…….”

“तू ये कर के रख मैं खाने की तैयारी कर के आती हूँ, ठीक से करना बेटे।”

अंदर जाते ही बाला ने अपने पति प्रकाश को सारी बात बताई। “पिछले हफ्ते जब तुम टूर पर थे तो मैंने उषा को समझाया कि अपनी बेटी को पढ़ाये। पढाई लिखाई कितनी जरूरी है, ये लोग कुछ समझते ही नहीं। परले दर्ज़े की मूर्ख है। कह रही थी बेटी अभी 9 साल की है, फिर भी झाड़ू-पोंछा कर लेती है। कपडे बर्तन भी सीखा रही है ताकि वो भी जल्दी किसी घर में काम पकड़ ले। बताओ, इस उम्र के बच्चे स्कूल जाएँ या घर घर काम करते भटकें!!”

“बाला, तुम्हारी सोच अपनी जगह ठीक है, मगर उषा की स्तिथि भी तो देखो, पति उसका ज्यादा कमाता नहीं है, वो खुद सारा दिन लगी रहती है, तब कहीं उनका खाने का बंदोबस्त हो पता है। ऐसे में ख़ुशी की स्कूल की फ़ीस, बाकि भी बहुत कुछ है सोचने हो।”

“नहीं नहीं, उसको मैंने वादा किया है, वो रोज़ भेजेगी अपनी बेटी को मेरे पास, थोड़े दिन बाद स्कूल में जायेगी तो उसकी फीस, यूनिफार्म और किताबों के पैसे हम ही देंगे, और वो राज़ी भी हो गयी है इस चीज़ के लिए। बस अब तकलीफ ये है की इसकी बेटी पढ़ने में बहुत कमज़ोर है। ज़रा रुझान बढे पढाई की तरफ़, फिर देखते हैं क्या होता है आगे।”

“अच्छी बात है बाला, तुम्हारी हमेशा ही इच्छा रहती है किसी की मदद करने की, इस बहाने तुम्हारा मन भी लगा रहेगा।”

“आंटी!! बाहर आइये ना! मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा!”

ख़ुशी की आवाज़ सुनते ही बाला और प्रकाश बाहर भागे। 1 हफ्ते में ये चौथी बार हुआ था। लड़की गश खा की गिर पड़ी थी। दोनों ने मिल कर उषा को समझाया भी कि बढ़ती बच्ची है, कमसिन है, ज़रा उसका ख़याल किया करे। पर वो सुनती ही कहाँ…..

बाला ने ख़ुशी के चेहरे पर पानी के छींटे डालते हुए उसको पूछा,”क्या खाया है री आज सुबह से, तेरी माँ को भी जाने ईश्वर ने किस मिट्टी से बनाया है!! समझती ही नहीं कुछ….”

“बाला, मैंने उषा को फ़ोन किया, कहीं बिजी है, कहती है 1 घंटे में आ पाएगी। तब तक तुम ख़ुशी को कुछ खाने को दो और आराम करने को कहो। ये पढाई तो कल कर लेगी वी।”

“आंटी, उपमा बहुत अच्छा बनाया है आपने। उस दिन पोहा भी बहुत अच्छा बनाया था। आंटी आप आलू के परांठे नहीं बनाते क्या? मम्मी तो कुछ भी बनाना नहीं जानती। आंटी आप सिखा दो ना उसको भी…..” उपमा निगलते हुए ख़ुशी बोलती जा रही थी लगातार।

आज शाम भी प्रकाश और बाला ने उषा को बहुत समझाया। वो हर बात में बस “हओ मेमसाब, हओ मेमसाब” कहती रही बस।

थक हार कर प्रकाश अपने रूम में चले गए और बाला भी दोनों माँ बेटी की किस्मत के बारे में सोचती हुई चौके में घुस गयी।

“क्यों रे! आज क्या खिलाया ऑन्टी ने? पता तो नहीं चला उनको कुछ! बस ऐसी ही एक्टिंग करती रह…. थोडा थोडा कुछ याद कर लिया कर। दोनों बुड्ढे खुश रहेंगे… तू अच्छे से खा पी लिया कर। ये दो घंटे के लिये मैंने भी एक और काम पकड़ लिया है। रात को आके ले जाया करुँगी मैं तुझे। ठीक है बेटा…..ये साहब और मेमसाहब भी न…कुछ समझते ही नहीं…… परले दर्ज़े के मूर्ख हैं!!”

शून्य

बारात घर के नज़दीक पहुँच गयी थी। बैंड बाजे की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। निर्मल के कानो में माँ के शब्द गूँजने लगे।

“माना की तृप्ति तेरी बहन है, पर इसका मतलब ये तो नहीं की तू और किसी से दोस्ती करेगी ही नहीं। उसने तो झट से कितनी सहेलियाँ बना ली, तू है की उसके पीछे पड़ी रहती है।”

“पर माँ, आपने ही तो कहा था कि वो उस शून्य से मेरे साथ है जब और कोई नहीं था। जुड़वाँ बहन से अच्छी और कोई सहेली मिल ही नहीं सकती। आज उसी का साथ छोड़ कर किसी और को दोस्त बनाने को कैसे कह दिया आपने!!”

“अरे बेटे, तृप्ति  के अलावा और कोई सहेली भी तो होनी चाहिए ना तेरी । अब कैसे समझाऊँ मैं इस लड़की को। हमेशा तो तुम दोनों साथ नहीं रहने वाली ना। उसके बिना रहने की भी आदत डाल ज़रा। कल को तुम दोनों अलग हो जाओगी तब क्या? लोगों से मिला जुला करो, बस इत्ता ही तो…..”

“माँ!! पहले तो हमें देख के आप कितने खुश होते थे। अब कह रहे हो एक दुसरे के बिना रहने की आदत डालो!! आप बदल गए हो, बिल्कुल बदल गए हो….”

” रो क्यों रही है पगली। तू गलत समझ रही है बिट्टो। मेरा कहने का मतलब सच में ये नहीं……  अरे सुन तो सही, क्यों रो रही है….. कहाँ भागी जा रही है, सुन तो….. निर्मल!!”

बाहर बैंड बज रहा था और निर्मल के मन में कुछ और ही चल रहा था। आज एकांत में उसके विचार कहाँ जा पहुंचे। गुस्सा कब आँसुओं में बदल गया उसे भी पता ना चला। ” कब से अकेली बैठी हूँ, और ये महारानी आज भी मुझे अकेला छोड़ में कहाँ गप्पे मारने चली गयी है। कोई परवाह ही नहीं है इसे मेरी। माँ एकदम सही कहती थी, मुझे भी बहुत सारी सहेलियाँ बना लेनी चाहिये थी। मैं पागल थी जो तृप्ति के लिए मरी जा रही थी!!”

“अरे ये क्या किया!! सारा काजल ख़राब कर दिया तूने। मुझे फिर से सारा मेकअप करना पड़ेगा। निर्मल, तू कितनी पागल है! ये आंसू विदाई के लिए बचा के रखने थे। अभी तो बारात दरवाजे पे खड़ी है, आँखों में आंसू भरेगी तो सौरव को दूल्हे के रूप में कैसे निहारेगी ?”

“तुझे उससे क्या!! मैं जीयूं या मरूं तू जा सबसे गपिया….मेरी परवाह तुझे थी ही कब….”

“मेरी पागल बहन, मैं तो तेरे लिए सैंडविच लेने गयी थी। लगा बड़ी देर से तूने कुछ खाया नहीं है, भूख लगी होगी…..”

“एक सैंडविच लाने में इत्ती देर! ये कहानी किसी और को सुनाना….”

” निर्मल, नहीं बेटे, आज गलती तृप्ति की नहीं है। मैंने ज़िद्द की थी इसके साथ यहाँ आने की। मेरे चक्कर में इसे भी धीरे चलना पड़ा।” बिजनौर वाली मामी दरवाजे की ओट से बोल पड़ी

निर्मल भाग के गयी और तृप्ति को गले लगा लिया, चाहे कुछ ही हो उसके जैसी बहन तो दुनिया में और किसी में पास नहीं है।

छवि

“माँ एक ऐसी”

“अच्छा बेटा”

“और….एक इस पोज़ में…”

“अच्छा बेटा”

” एक ऐसे भी, क्लोज अप”

“नया कैमरा देख के बिल्कुल ही बौरा गयी है। एक ही काम है अब सारा दिन!”

मीना अपनी बेटी की बातें सुनने में मगन हो गयी थी। उसे सारे घर में घूम घूम कर बातें करते देख वो बहुत भाव् विभोर हो उठी। उसके लटके झटके, उसकी अदाएं, चपलता, कितनी जल्दी बड़ी हो गयी थी कनक।

“तो, इसमें क्या है! अब तो खिंचवाँ लूँ मन भर के फ़ोटो। पता है मेरी सारी सहेलियों की तो बहुत सारी फ़ोटोज़ है, किसी किसी के पेरेंट्स ने तो उनको इस बार जन्मदिन पर उनके बचपन के फोटोज से ले के आज तक की फ़ोटोज़ का कॉलाज भी गिफ्ट किया है। एक मैं ही हूँ जिसकी बचपन की कोई फ़ोटो ही नहीं है। उनकी तो पूरी पूरी एल्बम है हर साल की।”

कनक की ये बात मीना को अपने मधुर आज से कटु कल की और खींच ले गयी। कनक अभी सिर्फ 6 माह की थी और महेश का नदी में डूबने से अकस्मात निधन हो गया था। अपने परिवार की सहायता से उसने आगे पढाई करी और एक प्रतिष्ठित बैंक में नौकरी पकड़ ली।

परिस्थितियों पर मीना धीरे धीरे विजय पा रही थी। उसने कभी हार ना मानी। कहने को ऐसे बुरे दिन भी नहीं थे। जरूरत की हर चीज़ थी उनके पास, पर फिजूलखर्च करने को तो पैसे नहीं थे।

कनक साल भर की होने को थी, चलना सीख रही थी, सारे घर में चलती, फिर गिरती, फिर उठती, फिर संभल कर चलती, मीना मन मसोस के रह जाती। वो चाह कर भी इतने पैसे न इकठे कर पायी की एक छोटा मोटा कैमरा ही खरीद ले।

पर कोई भी अपने मूल स्वभाव से कहाँ हट सकता है। मीना दुःखी रहने वाले लोगों में से न थी। उसने एक नोटबुक और कलम उठाई, लगी लिखने, जब पहली बार कनक ने पलटी खायी, उसका पहली बार बैठना, सरकना, घुटनो के बल चलना, और उसे माँ कह के पुकारना…. उसने हर घटना अपनी नोट बुक में लिख डाली। हर वो चीज़ जो अपनी यादों में ताज़ा रखना चाहती थी वो, उसकी नोटबुक में दर्ज़ होती गयी।

जब उसने अपनी नज़रें उठाई तो देखा कनक बिना गिरे, बिना रुके, डोलती हुई, फुदकती हुई उसकी ओर बढ़ी चली आ रही थी, अपने दोनों हाथो को हिलाते हुए, अपना बैलेंस बनाते हुए, इसी प्रयास में उसकी छोटी सी चुटिया भी कितनी प्यारी लग रही थी। उसकी सुरमई आँखे माँ को देखकर चमक रही थी, आगे से आते हुए नए नये दांत भी कैसे मोतियोँ समान लगे थे मीना को। छोटे छोटे पैर डग भरते हुए….. किलकारी गूँज उठी मीना के आँगन में….. मीना को ऐसा प्रतीत हो रहा था की आज सारी कहकशां ही उसके आँगन में उतर आई थी। इससे मनोरम दृश्य तो शायद ही फिर कभी आयेगा उसके जीवन में।

कैमरा तो ना था, पर उसकी आँखे तो थी। मीना ने कनक की वो छवि अपनी आँखों में क़ैद कर ली थी। अब वो जब जी चाहे, आँखे बंद कर, वापस अतीत के उसी आँगन में पहुँच सकती थी, फिर से अपनी परी को ठुमकते हुए देख सकती थी।

खारा पानी तैरने लगा मीना की झील से आँखों में।
” माँ!! प्लीज़…… अब फिर से मत शुरू हो जाना।”
कनक की बाँहे मीना को अतीत की गलियो से खींच कर फिर वर्तमान के गलियारे में ले आयीं।

” मैं तो सोच रही थी आपको सामने बिठा कर, आपकी आँखों में देखते हुए अपना एक स्कैच बना डालूँ। फिर तो मेरी भी बचपन की एक तस्वीर हमारे घर में होगी…… बिल्कुल वैसी छवि जैसी आपकी आँखों में क़ैद है…….”

“अच्छा, शैतान की नानी!!”

” चलो अब मेरी बारी, एक पोज़ ऐसे,उम्म्म .. हाँ बिल्कुल ऐसे ही…….अब बत्तीसी दिखाओ माँ तो मैं भी  एक फ़ोटो लूँ आपकी……..”

अजूबा

मुझे तुमपे तरस आता है

जब तुम किसी प्रकार का सौंदर्य नहीं देख पाते हो
जब संगीत सुन के भी तुम महसूस नहीं कर पाते
जब कोई रंग तुम्हे नहीं लुभाता है
मुझे तुमपे तरस आता है

जब फूलों की महक से तुम्हारा रोम रोम उच्छ्वासित नहीं होता
जब तुम नहीं देख पाते बादलों में छुपे आकार
जब वर्षा की बूंदों से तुम्हारा अंतस नहीं भीग पाता है
मुझे तुमपे तरस आता है

जब कोयल की कूक से तुम्हारे दिल में नहीं उठती कोई लहर
जब भोर की उजास नहीं कर पाता तरंगित तुम्हे
जब चांदनी रात में भी तुम्हे कल नहीं आता है
मुझे तुमपे तरस आता है

जब तुम नहीं पढ़ पाते मेरी आँखों को
जब तुम नहीं समझ पाते मेरी मुस्कान में छिपे दर्द
जब मेरी ख़ामोशी में छुपा सन्देश तुमहेे नहीं समझ आता है
मुझे तुमपे तरस आता है